भारत में इलेक्ट्रिक वाहनों (ईवी) की कहानी कागजों पर एक बड़ी सफलता नजर आती है। पिछले तीन वर्षों में सार्वजनिक चार्जिंग स्टेशनों की संख्या में लगभग छह गुना वृद्धि हुई है और ईवी की बिक्री में भी 19 प्रतिशत का इजाफा हुआ है। सरकार ने भी पीएम ई-ड्राइव योजना के तहत 10,900 करोड़ रुपये का बजट आवंटित किया है। लेकिन, इन चमकते आंकड़ों के पीछे एक कड़वा सच छिपा है। ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में ईवी और चार्जर का अनुपात 1:235 है, जबकि वैश्विक मानक 1:6 से 1:20 के बीच होना चाहिए। सबसे बड़ी समस्या यह है कि 38 प्रतिशत उपयोगकर्ता अभी भी अविश्वसनीय चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर को ईवी अपनाने में एक बड़ी बाधा मानते हैं।
गर्मियों में चार्जिंग परफॉरमेंस का गिरता स्तर
क्या आपने कभी सोचा है कि जब दिल्ली या राजस्थान में दोपहर का तापमान 46°C के पार होता है, तो 60 kW रेटिंग वाला एक फास्ट चार्जर कितनी बिजली डिलीवर करता है? हकीकत में, भारत में तैनात अधिकांश चार्जर ऐसी भीषण गर्मी में केवल 38 से 42 kW की बिजली ही दे पाते हैं। इसका कारण यह है कि भारत में उपयोग होने वाले अधिकांश फास्ट चार्जर सिलिकॉन आईजीबीटी (IGBT) आर्किटेक्चर पर आधारित हैं। यह तकनीक यूरोप और उत्तरी अमेरिका जैसे ठंडे प्रदेशों के लिए बनाई गई है, जहाँ गर्मियों का तापमान शायद ही कभी 35°C से ऊपर जाता है।
थर्मल डीरेटिंग: एक तकनीकी मजबूरी

जब बाहरी तापमान 45 से 50°C तक पहुँच जाता है, तो ये चार्जिंग सिस्टम अपनी थर्मल सीमाओं के करीब पहुँच जाते हैं। ऐसे में अपने पुर्जों को जलने से बचाने के लिए चार्जर खुद ही अपनी आउटपुट पावर कम कर देता है। इसे तकनीकी भाषा में ‘थर्मल डीरेटिंग’ कहा जाता है। ड्राइवर को लगता है कि उसकी कार चार्ज हो रही है, लेकिन वह नहीं जानता कि उसे 60 kW के बजाय केवल 40 kW के आसपास ही पावर मिल रही है। यह कोई मेंटेनेंस की खराबी नहीं है, बल्कि डिजाइन की एक ऐसी कमी है जिसे भारत के मौसम के हिसाब से नजरअंदाज किया गया है।
सिलिकॉन कार्बाइड (SiC) तकनीक: एक बेहतर समाधान
भारत की तपती गर्मियों के लिए सिलिकॉन कार्बाइड (SiC) मॉस्फेट आर्किटेक्चर एक निर्णायक समाधान पेश करता है। पारंपरिक सिलिकॉन आईजीबीटी चार्जर लगभग 96 प्रतिशत कुशल होते हैं, जबकि सिलिकॉन कार्बाइड आधारित चार्जर 98.5 प्रतिशत तक की दक्षता हासिल कर सकते हैं। इसे एक उदाहरण से समझें तो, 60 kW के आईजीबीटी आधारित चार्जर में 2.4 kW बिजली गर्मी के रूप में बर्बाद होती है, जबकि सिलिकॉन कार्बाइड चार्जर में यह नुकसान 900 वाट से भी कम होता है। कम आंतरिक गर्मी का मतलब है कि चार्जर के कूलिंग सिस्टम पर कम दबाव पड़ेगा और वह भीषण गर्मी में भी पूरी क्षमता के साथ काम कर सकेगा।
‘क्लाइमेट-रेडी’ इंफ्रास्ट्रक्चर का असली मतलब
भारत के लिए ‘क्लाइमेट-रेडी’ चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर का मतलब केवल गर्मी सहना नहीं है, बल्कि भारतीय परिस्थितियों के लिए डिजाइनिंग करना है। इसके लिए हमें कई स्तरों पर बदलाव की जरूरत है। सबसे पहले, चार्जर की खरीद के समय केवल लैब रिपोर्ट न देखी जाए, बल्कि 45°C और 50°C के तापमान पर उनकी वास्तविक आउटपुट क्षमता (थर्मल डीरेटिंग कर्व) को परखा जाए। इसके अलावा, चार्जिंग स्टेशन चलाने वाले ऑपरेटरों को भी यह समझना होगा कि यदि कोई चार्जर अपनी क्षमता का केवल 60 प्रतिशत दे रहा है, तो वह व्यावहारिक रूप से आंशिक रूप से ऑफलाइन ही माना जाएगा।
2030 के लक्ष्य और इंफ्रास्ट्रक्चर की गुणवत्ता
भारत ने 2030 तक निजी कारों में 30 प्रतिशत और दोपहिया व तिपहिया वाहनों में 80 प्रतिशत इलेक्ट्रिक पैठ का लक्ष्य रखा है। इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए केवल चार्जिंग स्टेशनों की संख्या बढ़ाना काफी नहीं है, बल्कि उनकी गुणवत्ता सुनिश्चित करना अनिवार्य है। हमें ऐसे इंफ्रास्ट्रक्चर की जरूरत है जो नवंबर और दिसंबर की तरह ही मई और जून की तपती दोपहरों में भी पूरी विश्वसनीयता के साथ काम करे। आज सही इंजीनियरिंग चुनाव करके ही हम एक मजबूत और टिकाऊ ईवी नेटवर्क की नींव रख सकते हैं।
भारतीय परिस्थितियों में चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर की चुनौतियाँ और समाधान
- अधिकांश चार्जर यूरोपीय मानकों पर आधारित हैं जो 35°C के अनुकूल हैं।
- भीषण गर्मी में ‘थर्मल डीरेटिंग’ के कारण आउटपुट पावर 30 से 40 प्रतिशत तक कम हो जाती है।
- सिलिकॉन कार्बाइड (SiC) आधारित चार्जर गर्मी कम पैदा करते हैं और अधिक कुशल होते हैं।
- खरीद प्रक्रियाओं में 50°C पर रेटेड आउटपुट को मानक बनाना आवश्यक है।
- कूलिंग सिस्टम पर अधिक दबाव पुर्जों की उम्र को कम कर देता है।
- विश्वसनीय चार्जिंग के बिना ईवी को बड़े पैमाने पर अपनाना मुश्किल है।
सिलिकॉन आईजीबीटी बनाम सिलिकॉन कार्बाइड (SiC) चार्जर की तुलना
| विशेषता | सिलिकॉन आईजीबीटी | सिलिकॉन कार्बाइड |
| प्रणाली दक्षता | लगभग 96 प्रतिशत | लगभग 98.5 प्रतिशत |
| आंतरिक ऊष्मा हानि (60 kW पर) | 2.4 kW | 0.9 kW से कम |
| 50°C तापमान पर प्रदर्शन | पावर आउटपुट कम हो जाता है | रेटेड आउटपुट बना रहता है |
| कूलिंग सिस्टम पर दबाव | बहुत अधिक | काफी कम |
| घटकों की विश्वसनीयता | गर्मी के कारण जोखिम अधिक | लंबी उम्र और बेहतर स्थिरता |
सामान्य प्रश्न (FAQ)
- गर्मियों में इलेक्ट्रिक कार चार्ज होने में अधिक समय क्यों लेती है?
- गर्मियों में तापमान अधिक होने के कारण चार्जर खुद को ठंडा रखने के लिए बिजली की सप्लाई कम कर देता है, जिसे थर्मल डीरेटिंग कहते हैं। इसी वजह से चार्जिंग धीमी हो जाती है।
- क्या सिलिकॉन कार्बाइड (SiC) चार्जर महंगे होते हैं?
- शुरुआती तौर पर ये थोड़े महंगे हो सकते हैं, लेकिन इनकी उच्च दक्षता और लंबी उम्र इन्हें लंबी अवधि के लिए अधिक किफायती बनाती है।
- भारत में ईवी और चार्जर का आदर्श अनुपात क्या होना चाहिए?
- वैश्विक स्तर पर हर 6 से 20 इलेक्ट्रिक वाहनों पर एक चार्जर का सुझाव दिया जाता है, जबकि भारत में वर्तमान में यह 235 वाहनों पर एक चार्जर है।
- क्या 50°C तापमान में चार्जिंग स्टेशन का इस्तेमाल सुरक्षित है?
- हाँ, चार्जर में सुरक्षा प्रणालियाँ होती हैं जो गर्मी बढ़ने पर पावर कम कर देती हैं, लेकिन बेहतर तकनीक (जैसे SiC) के बिना इनका प्रदर्शन गिर जाता है।
- थर्मल डीरेटिंग से बचने के लिए सरकार को क्या करना चाहिए?
- सरकार को चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए नए मानक तय करने चाहिए जो उच्च तापमान (45-50°C) पर भी पूर्ण प्रदर्शन की गारंटी देते हों।








