ईवी बैटरी डिग्रेडेशन और लाइफ: भारतीय मौसम में क्या असर, कैसे बचाएं और रिप्लेसमेंट कॉस्ट

Battery Health Degradation
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भारत में इलेक्ट्रिक वाहनों की डिमांड बहुत तेजी से बढ़ रही है। बजट हैचबैक से लेकर प्रीमियम एसयूवी तक, हर सेगमेंट में ग्राहक अब पेट्रोल और डीजल कारों को छोड़कर क्लीन एनर्जी की तरफ कदम बढ़ा रहे हैं। लेकिन जब भी कोई ग्राहक एक नई इलेक्ट्रिक कार खरीदने का मन बनाता है, तो उसके दिमाग में सबसे बड़ा सवाल गाड़ी की माइलेज या फीचर्स को लेकर नहीं, बल्कि उसकी मुख्य जान यानी बैटरी को लेकर होता है।

हर नया या पुराना ईवी खरीदार यह जानना चाहता है कि क्या भारत की भीषण गर्मी में गाड़ी की बैटरी जल्दी खराब हो जाएगी, उसकी कुल लाइफ कितनी होती है, और अगर वारंटी खत्म होने के बाद इसे बदलना पड़े तो जेब पर कितना बड़ा बोझ पड़ेगा। इस विस्तृत लेख में हम इन सभी सवालों के जवाब बहुत ही सरल शब्दों में और पूरी गहराई के साथ समझेंगे।

ईवी बैटरी डिग्रेडेशन क्या है और यह क्यों होता है

इलेक्ट्रिक गाड़ियों में लिथियम आयन बैटरी पैक का इस्तेमाल किया जाता है, जो बिल्कुल आपके स्मार्टफोन की बैटरी की तरह ही काम करती है। समय के साथ और लगातार चार्जिंग और डिस्चार्जिंग साइकिल से गुजरने के कारण इन बैटरियों की ओरिजिनल क्षमता धीरे-धीरे कम होने लगती है। इसी प्रक्रिया को बैटरी डिग्रेडेशन कहा जाता है।

आसान भाषा में समझें तो जब गाड़ी बिल्कुल नई होती है, तो उसका बैटरी पैक अपनी पूरी क्षमता से बिजली स्टोर करता है, जिससे गाड़ी को अधिकतम रेंज मिलती है। लेकिन कुछ साल इस्तेमाल करने के बाद, अगर उसकी कुल क्षमता घटकर अस्सी प्रतिशत रह जाती है, तो फुल चार्ज होने पर भी गाड़ी पहले जितनी दूरी तय नहीं कर पाएगी। यह एक बेहद प्राकृतिक प्रक्रिया है और दुनिया के हर लिथियम आयन सेल के साथ ऐसा होना तय है।

गाड़ी चलते समय और चार्ज होते समय बैटरी के अंदर रासायनिक बदलाव होते हैं। इन रासायनिक प्रतिक्रियाओं के दौरान बैटरियों के अंदर मौजूद लिथियम आयन समय के साथ निष्क्रिय होने लगते हैं। इसके अलावा बैटरी मैनेजमेंट सिस्टम जिसे हम बीएमएस कहते हैं, वह भी लगातार काम करता है और बैटरी की सुरक्षा के लिए एक निश्चित सीमा के बाद चार्जिंग को धीमा कर देता है ताकि डिग्रेडेशन की रफ्तार को रोका जा सके।

भारतीय मौसम और तापमान का बैटरी पर असर

भारतीय उपमहाद्वीप का मौसम दुनिया के बाकी हिस्सों से काफी अलग और चुनौतीपूर्ण है। उत्तर भारत के मैदानी इलाकों में जहां गर्मियों में तापमान पैंतालीस डिग्री सेल्सियस के पार चला जाता है, वहीं दक्षिण और तटीय इलाकों में भारी उमस रहती है। लिथियम आयन बैटरियों के लिए सबसे आदर्श तापमान पच्चीस से पैंतीस डिग्री सेल्सियस के बीच माना जाता है। जब तापमान इस सीमा से ऊपर जाता है, तो बैटरी के अंदरूनी हिस्सों पर थर्मल स्ट्रेस यानी गर्मी का दबाव बहुत ज्यादा बढ़ जाता है।

अत्यधिक गर्मी के कारण बैटरी के अंदर होने वाली रासायनिक क्रियाएं बहुत तेज हो जाती हैं, जिससे सेल के अंदरूनी कंपोनेंट्स जल्दी खराब होने लगते हैं। भारत में चलने वाली ज्यादातर आधुनिक इलेक्ट्रिक कारों में लिक्विड कूलिंग सिस्टम दिया जाता है, जो बैटरी को ठंडा रखने के लिए लगातार काम करता है। लेकिन जब बाहर का तापमान खुद ही बहुत ज्यादा हो, तो इस कूलिंग सिस्टम को भी बैटरी का तापमान बनाए रखने के लिए दोगुनी मेहनत करनी पड़ती है। इसके लिए कूलिंग फैन और पंप लगातार चलते हैं, जिससे गाड़ी की खुद की एनर्जी भी खर्च होती है और गर्मियों में गाड़ी की कुल रेंज में भी थोड़ी गिरावट देखने को मिलती है।

इसके उलट सर्दियों के मौसम में, विशेषकर भारत के पहाड़ी इलाकों में जहां तापमान पांच डिग्री या उससे नीचे चला जाता है, वहां बैटरी के अंदर केमिकल रिएक्शन काफी धीमे हो जाते हैं। ऐसी स्थिति में बैटरी अपनी पूरी क्षमता से पावर डिलीवर नहीं कर पाती, जिससे गाड़ी की परफॉर्मेंस और रेंज दोनों पर कुछ समय के लिए असर पड़ता है। हालांकि, ठंड के कारण होने वाला यह असर अस्थाई होता है और मौसम सामान्य होते ही ठीक हो जाता है, लेकिन अत्यधिक गर्मी से होने वाला डिग्रेडेशन स्थाई होता है जिसे वापस ठीक नहीं किया जा सकता।

भारत में लोकप्रिय कारों की बैटरी लाइफ और वारंटी

MG Comet EV
MG Comet EV

भारतीय बाजार में टाटा मोटर्स, एमजी मोटर्स और महिंद्रा जैसी कंपनियां अपनी गाड़ियों पर काफी लंबी वारंटी दे रही हैं। आमतौर पर सभी बड़े ब्रांड्स अपनी ईवी बैटरियों पर आठ साल या एक लाख साठ हजार km तक की वारंटी देते हैं। इस वारंटी का सीधा मतलब यह होता है कि अगर इस तय समय या दूरी के भीतर आपकी गाड़ी की बैटरी हेल्थ सत्तर प्रतिशत या उससे नीचे चली जाती है, तो कंपनी आपको मुफ्त में बैटरी पैक बदलकर या उसे रिपेयर करके देगी।

आधुनिक लिथियम आयरन फॉस्फेट यानी एलएफपी बैटरियां, जो भारत की ज्यादातर बजट और मिड-रेंज कारों में इस्तेमाल हो रही हैं, उनकी लाइफ काफी बेहतर होती है। अगर गाड़ी को सही तरीके से मेंटेन किया जाए, तो वारंटी खत्म होने के बाद भी यानी आठ या दस साल के बाद भी यह बैटरियां अपनी सत्तर से पचहत्तर प्रतिशत क्षमता आसानी से बनाए रखती हैं। इसका मतलब है कि एक आम यूजर के लिए गाड़ी दस साल के बाद भी पूरी तरह से इस्तेमाल करने लायक रहेगी, बस उसकी फुल चार्ज पर मिलने वाली रेंज थोड़ी कम हो जाएगी।

बैटरी लाइफ बढ़ाने के सबसे कारगर तरीके

इलेक्ट्रिक कार की बैटरी को लंबे समय तक सुरक्षित और सेहतमंद रखने के लिए कुछ बहुत ही आसान लेकिन जरूरी नियमों का पालन करना पड़ता है। अगर आप इन आदतों को अपनी रोजमर्रा की ड्राइविंग और चार्जिंग रूटीन में शामिल कर लें, तो आपकी गाड़ी की बैटरी लाइफ कई साल बढ़ सकती है।

नियमित रूप से फास्ट चार्जिंग के इस्तेमाल से बचें। डीसी फास्ट चार्जर बहुत ही कम समय में गाड़ी को चार्ज कर देते हैं, लेकिन इस प्रक्रिया में बहुत तेज करंट बैटरी के अंदर जाता है जिससे भारी मात्रा में गर्मी पैदा होती है। यह गर्मी सेल्स को नुकसान पहुंचाती है। इसलिए कोशिश करें कि अस्सी प्रतिशत मामलों में घर या ऑफिस के स्लो एसी चार्जर का ही उपयोग करें और फास्ट चार्जर का इस्तेमाल केवल हाईवे ट्रिप या इमरजेंसी के समय ही करें।

अपनी गाड़ी को कभी भी लंबे समय तक पूरी तरह खाली यानी शून्य प्रतिशत या पूरी तरह फुल यानी सौ प्रतिशत पर पार्क करके न छोड़ें। लिथियम आयन बैटरियों के लिए सबसे सुरक्षित और तनावमुक्त स्टेट ऑफ चार्ज बीस से अस्सी प्रतिशत के बीच माना जाता है। अगर आपको गाड़ी को कुछ दिनों के लिए खड़ा करना है, तो उसे लगभग पचास प्रतिशत तक चार्ज करके छोड़ें।

धूप में गाड़ी पार्क करने से बचें। जब गाड़ी सीधे तेज धूप में खड़ी होती है, तो केबिन के साथ-साथ नीचे लगा बैटरी पैक भी बहुत गर्म हो जाता है। थर्मल मैनेजमेंट सिस्टम बंद गाड़ी में काम नहीं करता, जिससे सेल्स लगातार गर्मी में तपते रहते हैं। हमेशा गाड़ी को किसी शेड के नीचे या बेसमेंट पार्किंग में लगाने की कोशिश करें। इसके अलावा, लंबी ड्राइव से तुरंत लौटकर गाड़ी को चार्जिंग पर न लगाएं। सफर के तुरंत बाद बैटरी का तापमान बढ़ा हुआ होता है, उसे कम से कम आधा घंटा ठंडा होने दें और उसके बाद ही चार्जर प्लग-इन करें।

भारत में ईवी बैटरी रिप्लेसमेंट कॉस्ट का पूरा गणित

अब बात करते हैं उस सबसे बड़े डर की जो हर ग्राहक के मन में होता है कि अगर वारंटी के बाद बैटरी बदलनी पड़ी तो कितना खर्च आएगा। वर्तमान में भारत में बैटरी बदलने की लागत लगभग पंद्रह हजार रुपये से लेकर पच्चीस हजार रुपये प्रति kWh तक बैठती है। यह खर्च पूरी तरह से इस बात पर निर्भर करता है कि आपकी गाड़ी में कितने बड़े साइज का बैटरी पैक लगा हुआ है।

राहत की बात यह है कि पिछले कुछ सालों में वैश्विक स्तर पर और भारत के घरेलू बाजार में भी बैटरी निर्माण की लागत में लगातार कमी आ रही है। जैसे-जैसे भारत में ही बैटरियों का बड़े पैमाने पर प्रोडक्शन शुरू हो रहा है, यह लागत आने वाले पांच से सात सालों में और भी ज्यादा कम होने की पूरी उम्मीद है। नीचे दी गई तालिका से आप भारत की सबसे लोकप्रिय इलेक्ट्रिक कारों की अनुमानित बैटरी क्षमता और वारंटी के बाद उनकी संभावित रिप्लेसमेंट कॉस्ट को आसानी से समझ सकते हैं।

गाड़ी का नामबैटरी पैक क्षमता (kWh)अनुमानित रिप्लेसमेंट कॉस्ट (रुपये में)
एमजी कॉमेट ईवी17.3 kWh₹3,00,000 से ₹3,50,000
टाटा टियागो ईवी19.2 kWh₹3,50,000 से ₹4,00,000
टाटा टिगोर ईवी24.0 kWh₹4,50,000 से ₹5,50,000
टाटा नेक्सॉन ईवी (कम रेंज)30.2 kWh₹5,50,000 से ₹6,50,000
महिंद्रा एक्सयूवी40034.5 kWh₹5,00,000 से ₹6,00,000
टाटा नेक्सॉन ईवी (लंबी रेंज)40.5 kWh₹6,50,000 से ₹8,00,000
एमजी जेडएस ईवी50.3 kWh₹7,00,000 से ₹8,50,000
हुंडई कोना इलेक्ट्रिक39.2 kWh₹11,00,000 से ₹12,00,000
बीयाइडी एटो 360.4 kWh₹9,00,000 से ₹11,00,000

इस तालिका को देखकर डरने की बिल्कुल जरूरत नहीं है क्योंकि यह स्थिति तभी आएगी जब आप वारंटी के आठ साल पूरे कर लेंगे या आपकी गाड़ी एक लाख साठ हजार km से ज्यादा चल चुकी होगी। तब तक गाड़ी अपनी रनिंग कॉस्ट यानी पेट्रोल-डीजल के मुकाबले की जाने वाली बचत से अपनी पूरी कीमत कई बार वसूल कर चुकी होगी।

क्या पूरी बैटरी बदलना हमेशा जरूरी होता है

एक बहुत ही महत्वपूर्ण बात जो ज्यादातर लोग नहीं जानते वो यह है कि किसी भी ईवी का बैटरी पैक कोई एक सिंगल ब्लॉक नहीं होता। यह छोटे-छोटे सैकड़ों सेल्स से मिलकर बनता है, जिन्हें ग्रुप करके मॉड्यूल बनाए जाते हैं और फिर कई मॉड्यूल्स को मिलाकर एक पूरा बैटरी पैक तैयार होता है।

जब किसी गाड़ी की बैटरी में खराबी आती है या रेंज अचानक कम हो जाती है, तो अस्सी प्रतिशत मामलों में पूरा बैटरी पैक खराब नहीं होता। केवल कुछ विशेष सेल्स या कोई एक मॉड्यूल ही डेड होता है। भविष्य में जैसे-जैसे भारत का ईवी रिपेयर मार्केट और कंपोनेंट लेवल मैकेनिक नेटवर्क मजबूत होगा, कंपनियां और ऑथराइज्ड सर्विस सेंटर पूरी बैटरी बदलने के बजाय सिर्फ खराब हो चुके मॉड्यूल्स को बदलने की सुविधा बड़े पैमाने पर देना शुरू कर देंगे। इसे मॉड्यूल-लेवल रिपेयरिंग कहा जाता है और इस तरीके से आपकी बैटरी को ठीक करने का खर्च पूरी नई बैटरी के मुकाबले केवल दस से पंद्रह प्रतिशत ही आएगा।

इसके साथ ही, जब आठ या दस साल बाद आपकी कार की बैटरी गाड़ी चलाने लायक नहीं रह जाएगी, तब भी उसकी स्क्रैप वैल्यू यानी रीसेल वैल्यू काफी अच्छी होती है। इन पुरानी बैटरियों का इस्तेमाल एनर्जी स्टोरेज सिस्टम, घरों के इनवर्टर या सोलर पावर ग्रिड में किया जाता है। कंपनियां इन पुरानी बैटरियों को अच्छे दामों पर वापस खरीद लेती हैं, जिससे नई बैटरी खरीदते समय ग्राहकों को एक बड़ा डिस्काउंट या कैशबैक मिल जाता है।

अंत में क्या समझना चाहिए

भारत के गर्म और चुनौतीपूर्ण मौसम में इलेक्ट्रिक गाड़ी की बैटरी को लेकर चिंता होना स्वाभाविक है, लेकिन आज की एडवांस टेक्नोलॉजी और बेहतर कूलिंग सिस्टम्स की बदौलत यह चिंता काफी हद तक दूर हो चुकी है। भारतीय सड़कों पर दौड़ रही लाखों इलेक्ट्रिक कारें इस बात का सबूत हैं कि अगर थोड़ी सी समझदारी दिखाई जाए, तो आठ से दस साल तक बैटरी में कोई बड़ी समस्या नहीं आती है।

अगर आप एक नई इलेक्ट्रिक कार खरीदने की सोच रहे हैं, तो बैटरी की उम्र या उसके खराब होने के डर से अपना फैसला न बदलें। कंपनियों द्वारा दी जा रही आठ साल की लंबी वारंटी आपके पैसे को पूरी तरह सुरक्षित रखती है। बस आपको अपनी गाड़ी को चार्ज करते समय और चलाते समय कुछ बुनियादी बातों का ध्यान रखना है, जैसे कि तेज धूप से बचाना और स्लो एसी चार्जिंग को प्राथमिकता देना। लंबी अवधि में एक इलेक्ट्रिक कार न सिर्फ पर्यावरण के लिए बेहतर साबित होती है, बल्कि ईंधन पर होने वाले भारी खर्च को बचाकर आपकी जेब को भी बड़ा फायदा पहुंचाती है।

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