आज के दौर में जब दुनिया तेजी से इलेक्ट्रिक मोबिलिटी की ओर बढ़ रही है, भारत ने सस्टेनेबल फ्यूचर की दिशा में एक बड़ा कदम उठाया है। रॉकलिंक इंडिया प्राइवेट लिमिटेड ने उत्तर प्रदेश के सिकंदराबाद स्थित UPSIDC औद्योगिक क्षेत्र में अपनी पहली एकीकृत रीसाइक्लिंग सुविधा शुरू करने की घोषणा की है। यह प्लांट न केवल लिथियम-आयन बैटरी को रीसायकल करेगा, बल्कि दुर्लभ पृथ्वी चुम्बकों और धातु युक्त औद्योगिक कचरे के लिए भी भारत की सर्कुलर इकोनॉमी को मजबूती देगा।
लिथियम-आयन बैटरी और मैग्नेट रीसाइक्लिंग की विशाल क्षमता
रॉकलिंक इंडिया की यह नई सुविधा सालाना 10,000 टन लिथियम-आयन बैटरी को प्रोसेस करने की क्षमता रखती है। इसके अलावा, कंपनी ने दुर्लभ पृथ्वी चुम्बकों के प्रसंस्करण के लिए भी विशेष व्यवस्था की है, जिसकी क्षमता 60 टन प्रति माह है। भविष्य की योजनाओं पर नजर डालें तो, कंपनी 2026 की पहली तिमाही तक 1,500 टन प्रति वर्ष की क्षमता वाली ‘रेयर अर्थ क्लोराइड’ प्रोसेसिंग लाइन भी शुरू करने वाली है। यह कदम भारत की घरेलू सामग्री रिकवरी क्षमताओं को विश्व स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाएगा।
कच्चे माल के आयात पर निर्भरता होगी कम

रॉकलिंक इंडिया के निदेशक, लियोनार्ड अलेक्जेंडर अनसोर्ज, के अनुसार यह सुविधा इलेक्ट्रिक वाहनों (EV), नवीकरणीय ऊर्जा और उन्नत विनिर्माण जैसे क्षेत्रों के लिए आवश्यक महत्वपूर्ण कच्चे माल की बढ़ती मांग को पूरा करने के उद्देश्य से बनाई गई है। घरेलू रीसाइक्लिंग इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित होने से भारत को विदेशों से आयात होने वाले महंगे कच्चे माल पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा, जिससे आपूर्ति श्रृंखला में स्थिरता आएगी।
अत्याधुनिक ‘R2’ तकनीक और 98% रिकवरी दक्षता
यह प्लांट भारत के एक्सटेंडेड प्रोड्यूसर रिस्पॉन्सिबिलिटी (EPR) ढांचे के तहत पंजीकृत है और 95 विभिन्न प्रकार के बैटरी कचरे को संभालने में सक्षम है। कंपनी अपनी इन-हाउस विकसित R2 तकनीक का उपयोग करती है, जो खतरनाक यौगिकों को सुरक्षित रूप से हटाते हुए बैटरी सामग्री को प्रोसेस करती है। रॉकलिंक इंडिया का दावा है कि उनकी प्रक्रिया से एल्युमीनियम, तांबा और लोहे जैसी प्रमुख धातुओं की 98% से अधिक रिकवरी हासिल की जा सकती है। इससे निकलने वाला उच्च शुद्धता वाला ‘ब्लैक मास’ (Black Mass) बैटरी-ग्रेड तत्वों के रिफाइनिंग में बहुत महत्वपूर्ण होता है।
बैटरी रिफर्बिशमेंट: संसाधनों का अधिकतम उपयोग
केवल रीसाइक्लिंग ही नहीं, कंपनी इस साइट पर बैटरी रिफर्बिशमेंट कार्य भी शुरू करने की योजना बना रही है। इसमें उपयोग की जा चुकी बैटरी सेल का परीक्षण, संतुलन और रीपैकेजिंग की जाएगी ताकि उनके जीवन चक्र को बढ़ाया जा सके। यह दृष्टिकोण न केवल संसाधनों की दक्षता में सुधार करेगा बल्कि कचरे को कम करने में भी प्रभावी साबित होगा। यह पर्यावरण और अर्थव्यवस्था दोनों के लिए एक “विन-विन” स्थिति है।
मैग्साइकिल और रेयर अर्थ मैग्नेट रीसाइक्लिंग
दुर्लभ पृथ्वी चुम्बक जैसे NdFeB, SmCo और AlNiCo का उपयोग इलेक्ट्रिक मोटरों और औद्योगिक उपकरणों में व्यापक रूप से किया जाता है। रॉकलिंक इंडिया ने इनके लिए समर्पित रीसाइक्लिंग सिस्टम और सेमी-ऑटोमेटेड डिसमेंटलिंग लाइनें स्थापित की हैं। इसके साथ ही, कंपनी भारत में अपना रिवर्स लॉजिस्टिक्स मॉडल पेश कर रही है। यूरोप में सफल रहा यह मॉडल मैग्नेट स्क्रैप के संगठित संग्रह और रीसाइक्लिंग स्ट्रीम पर ध्यान केंद्रित करता है, जिससे पूरी सप्लाई चेन पारदर्शी बनती है।
“नो योर मटेरियल” (KYM) और भविष्य की साझेदारी
प्रसंस्करण दक्षता बढ़ाने के लिए कंपनी “नो योर मटेरियल” (KYM) दृष्टिकोण का पालन करती है। इसके तहत इन-हाउस प्रयोगशाला परीक्षणों के माध्यम से सबसे सटीक रीसाइक्लिंग मार्ग निर्धारित किया जाता है। जो सामग्री सीधे रीसायकल नहीं की जा सकती, उसे आगामी यूनिट में उच्च तापमान वाले रोटरी भट्ठा सिस्टम का उपयोग करके रेयर अर्थ क्लोराइड में बदल दिया जाएगा। रॉकलिंक इंडिया स्टार्टअप्स, अनुसंधान संस्थानों और सरकारी निकायों के साथ मिलकर भारत की घरेलू आपूर्ति श्रृंखला को और अधिक मजबूत करने के लिए प्रतिबद्ध है।









