भारत में छिड़ गई है एथनॉल और इलेक्ट्रिक गाड़ियों (इवी) के बीच की जंग, जानिए आपके लिए क्या है बेहतर?

EV VS Ethanol
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भारतीय ऑटोमोटिव बाजार इस समय एक बहुत ही बड़े बदलाव के दौर से गुजर रहा है। एक तरफ जहां सरकार और कई बड़ी कंपनियां सड़कों पर केवल इलेक्ट्रिक व्हीकल्स को दौड़ाने के लिए पूरी ताकत झोंक रही हैं, वहीं दूसरी तरफ पर्दे के पीछे एक और बहुत बड़ी गेम चेंजर तकनीक खामोशी से अपने पैर पसार रही है, जिसे हम एथनॉल ब्लेंडेड फ्यूल या फ्लेक्स फ्यूल के नाम से जानते हैं। आम ग्राहकों को लगता है कि आने वाला कल सिर्फ और सिर्फ बैटरी से चलने वाली गाड़ियों का ही है, लेकिन हकीकत इससे कोसों दूर है। भारत जैसे विशाल और खेती प्रधान देश में कच्चे तेल के आयात को कम करने और प्रदूषण पर लगाम लगाने के लिए एथनॉल एक बहुत बड़े हथियार के रूप में उभर कर सामने आया है। ऐसे में भारतीय ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री के भीतर अब एक अघोषित और गुप्त युद्ध शुरू हो चुका है कि भविष्य की सड़कों पर राज आखिर कौन करेगा, बिजली से चलने वाली शांत कारें या फिर एथनॉल से मकरंद उगलने वाले ट्रेडिशनल इंजन।

इस छिड़ी हुई जंग का सीधा असर सीधे तौर पर आम आदमी की जेब, गाड़ी चलाने के तौर-तरीकों और देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाला है। सरकार एक तरफ ईवी चार्जिंग इन्फ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करने के लिए भारी सब्सिडी दे रही है, तो वहीं दूसरी तरफ देश के चीनी मिल मालिकों और किसानों को एथनॉल का उत्पादन बढ़ाने के लिए लगातार प्रोत्साहित किया जा रहा है। मारुति सुजुकी और टोयोटा जैसी बड़ी कार कंपनियां फ्लेक्स-फ्यूल इंजनों पर बहुत बड़ा दांव खेल रही हैं, जबकि टाटा और महिंद्रा जैसी दिग्गज कंपनियां अपने बेहतरीन ईवी पोर्टफोलियो को लगातार बढ़ा रही हैं। एक समझदार खरीदार होने के नाते आपके लिए यह जानना बेहद जरूरी है कि इन दोनों तकनीकों में से कौन सी आपके लिए आने वाले पांच से दस सालों में सबसे ज्यादा फायदेमंद और व्यावहारिक साबित होगी। आइए इस गुप्त जंग के हर एक पहलू का बहुत ही गहराई से और आसान शब्दों में विश्लेषण करते हैं।

क्या है एथनॉल का पूरा गणित और क्यों यह अचानक बन गया है इलेक्ट्रिक गाड़ियों का सबसे बड़ा सिरदर्द

इस पूरे खेल को समझने के लिए सबसे पहले यह जानना जरूरी है कि आखिर यह एथनॉल बला क्या है। सीधे और सादे शब्दों में कहें तो एथनॉल एक तरह का बायोफ्यूल यानी अल्कोहल होता है, जिसे गन्ने के रस, मक्के, खराब हो चुके अनाज और कृषि के बचे हुए कचरे को फरमेंट करके तैयार किया जाता है। चूंकि भारत पूरी दुनिया में गन्ने और अनाज के सबसे बड़े उत्पादकों में से एक है, इसलिए हमारे पास एथनॉल बनाने के लिए कच्चे माल की कोई कमी नहीं है। सरकार का लक्ष्य पेट्रोल में 20 प्रतिशत एथनॉल मिलाने का है, जिसे E20 फ्यूल कहा जाता है, और आने वाले समय में इसे बढ़ाकर सीधे 100 प्रतिशत यानी E100 करने की तैयारी है, जिसे फ्लेक्स-फ्यूल गाड़ियां कहा जाता है।

अब बात करते हैं कि यह इलेक्ट्रिक गाड़ियों के लिए सिरदर्द क्यों बन गया है। इलेक्ट्रिक गाड़ियों के साथ इस समय भारत में सबसे बड़ी समस्या यह है कि इनकी शुरुआती कीमत बहुत ज्यादा होती है और इनके लिए चार्जिंग इन्फ्रास्ट्रक्चर अभी भी केवल बड़े शहरों तक ही सीमित है। वहीं दूसरी तरफ, एथनॉल से चलने वाली फ्लेक्स-फ्यूल गाड़ियां हमारे उसी पुराने और भरोसेमंद पेट्रोल इंजन तकनीक पर काम करती हैं जिसे हम सालों से चलाते आ रहे हैं। कंपनियों को इंजन में बस थोड़े से बदलाव करने होते हैं, जिससे गाड़ी की कीमत बहुत ज्यादा नहीं बढ़ती। ग्राहक को अपनी गाड़ी में ईंधन भराने के लिए घंटों इंतजार नहीं करना पड़ता, वह सीधे किसी भी पेट्रोल पंप पर जाकर कुछ मिनटों में टैंक फुल करवा सकता है। यही व्यावहारिक आसानी एथनॉल को इलेक्ट्रिक गाड़ियों के सामने एक बहुत मजबूत दावेदार के रूप में खड़ा कर देती है।

शुरुआती कीमत का बहुत बड़ा फासला जो मिडिल क्लास को सोचने पर कर रहा है मजबूर

Ethanol VS EV
Ethanol VS EV

भारत एक ऐसा बाजार है जहां गाड़ी की कीमत यानी बजट सबसे बड़ा फैक्टर होता है। अगर हम आज एक मध्यम आकार की पेट्रोल कार और उसी के इलेक्ट्रिक वेरिएंट की कीमतों की तुलना करें, तो दोनों के बीच कम से कम ₹ 3.00 लाख से ₹ 5.00 लाख तक का बहुत बड़ा अंतर देखने को मिलता है। उदाहरण के तौर पर, यदि कोई सामान्य पेट्रोल या फ्लेक्स-फ्यूल कार आपको ₹ 8.00 लाख में मिल रही है, तो उसी साइज और फीचर्स वाली इलेक्ट्रिक कार के लिए आपको आसानी से ₹ 12.00 लाख या ₹ 13.00 लाख से ज्यादा खर्च करने पड़ते हैं। यह भारी-भरकम शुरुआती निवेश एक आम मध्यमवर्गीय परिवार के बजट को पूरी तरह से बिगाड़ देता है।

यहीं पर एथनॉल और फ्लेक्स-फ्यूल तकनीक बाजी मार ले जाती है। कार निर्माताओं के लिए एक सामान्य पेट्रोल इंजन को फ्लेक्स-फ्यूल इंजन में बदलने की लागत बहुत ही मामूली होती है। इसके लिए उन्हें केवल फ्यूल पंप, फ्यूल लाइनों और इंजन मैपिंग में थोड़े से बदलाव करने होते हैं, जिससे गाड़ी की एक्स-शोरूम कीमत में बमुश्किल ₹ 20,000 से ₹ 30,000 तक का ही इजाफा होता है। इसका सीधा मतलब यह है कि एक आम ग्राहक बिना लाखों रुपये का अतिरिक्त बोझ उठाए एक पर्यावरण के अनुकूल गाड़ी का मालिक बन सकता है। जो लोग ईवी खरीदने के लिए भारी-भरकम लोन और उसकी किश्तों का दबाव नहीं झेलना चाहते, उनके लिए एथनॉल गाड़ियां एक बहुत ही आसान और सस्ता रास्ता बनकर सामने आ रही हैं।

रेंज एंजाइटी का डर या दो मिनट में टैंक फुल कराने की पुरानी और आरामदायक आदत

इलेक्ट्रिक गाड़ी मालिकों के बीच एक शब्द बहुत ज्यादा मशहूर है, जिसे रेंज एंजाइटी कहा जाता है। इसका मतलब है कि गाड़ी चलाते समय हमेशा स्क्रीन पर बची हुई बैटरी के प्रतिशत को देखते रहना और मन में यह डर बने रहना कि कहीं सुनसान रास्ते पर या हाईवे के बीच में चार्जिंग खत्म न हो जाए। भारत में आज भी हाईवे पर हर कुछ किलोमीटर के बाद फास्ट चार्जिंग स्टेशंस का मिलना एक सपने जैसा ही है। इसके अलावा, अगर आपको कोई फास्ट चार्जर मिल भी जाता है, तो वहां गाड़ी को 10 प्रतिशत से 80 प्रतिशत तक चार्ज होने में कम से कम 45 से 60 मिनट का लंबा समय लग जाता है, बशर्ते वहां पहले से कोई दूसरी गाड़ी लाइन में न खड़ी हो।

एथनॉल से चलने वाली गाड़ियों में रेंज एंजाइटी नाम का कोई शब्द ही नहीं होता। चूंकि ये गाड़ियां मौजूदा पेट्रोल पंप नेटवर्क का ही इस्तेमाल करती हैं, इसलिए आप देश के किसी भी सुदूर कोने में चले जाएं, आपको ईंधन की कोई कमी नहीं होगी। आप बस पंप पर रुकते हैं, दो मिनट के भीतर अपनी गाड़ी का टैंक फुल करवाते हैं और बिना किसी फिक्र के सैकड़ों किलोमीटर के लंबे सफर पर दोबारा निकल जाते हैं। भारतीय ग्राहकों की सालों पुरानी इस आरामदायक आदत को बदलना इलेक्ट्रिक गाड़ियों के लिए सबसे बड़ी चुनौती साबित हो रहा है। जब तक देश में मोबाइल टावरों की तरह हर नुक्कड़ पर चार्जिंग प्वाइंट्स नहीं आ जाते, तब तक लंबी दूरी तय करने वाले चालकों के लिए एथनॉल एक बहुत ही सुरक्षित और टेंशन-मुक्त विकल्प बना रहेगा।

पर्यावरण की असली सुरक्षा का सच क्या वाकई इलेक्ट्रिक गाड़ियां पूरी तरह से साफ-सुथरी हैं

जब भी इलेक्ट्रिक व्हीकल्स का विज्ञापन किया जाता है, तो उन्हें जीरो एमिशन यानी शून्य प्रदूषण फैलाने वाली गाड़ियों के रूप में पेश किया जाता है। यह बात सच है कि इन गाड़ियों के पीछे कोई साइलेंसर नहीं होता और इनसे सड़कों पर कोई धुआं नहीं निकलता, लेकिन अगर हम इसके पीछे के पूरे सच को देखें, तो कहानी थोड़ी बदल जाती है। भारत में आज भी लगभग 60 से 65 प्रतिशत बिजली का उत्पादन कोयले को जलाकर किया जाता है। इसका मतलब यह हुआ कि आपकी इलेक्ट्रिक कार को चार्ज करने के लिए जो बिजली आ रही है, उसे बनाने के लिए कहीं न कहीं भारी मात्रा में कोयला जलाया जा रहा है और पर्यावरण में प्रदूषण फैल रहा है। इसके साथ ही, ईवी में इस्तेमाल होने वाली लिथियम-आयन बैटरियों के निर्माण और बाद में उनके डिस्पोजल की प्रक्रिया भी पर्यावरण के लिए एक बहुत बड़ी चुनौती है।

दूसरी तरफ, एथनॉल को एक पूरी तरह से रिन्यूएबल यानी नवीकरणीय ऊर्जा का स्रोत माना जाता है। एथनॉल बनाने वाले पौधे यानी गन्ना और मक्का अपने जीवनकाल के दौरान वातावरण से कार्बन डाइऑक्साइड को सोखते हैं। जब इस एथनॉल को गाड़ियों में जलाया जाता है, तो उससे निकलने वाला कार्बन लगभग उसी मात्रा के बराबर होता है जो पौधों ने पहले ही सोख लिया था। इसे हम कार्बन न्यूट्रल साइकिल कहते हैं। इसके अलावा, पेट्रोल में एथनॉल मिलाने से इंजन से निकलने वाली कार्बन मोनोऑक्साइड और हाइड्रोकार्बन जैसी हानिकारक गैसों में सीधे 30 से 40 प्रतिशत तक की भारी कमी आती है। इसलिए पर्यावरण सुरक्षा के मामले में एथनॉल भी इलेक्ट्रिक गाड़ियों को बहुत ही कड़ी और मजबूत टक्कर दे रहा है।

रनिंग कॉस्ट का असली मुकाबला हर किलोमीटर पर आपकी जेब से कितना पैसा खर्च होगा

गाड़ी खरीदने के बाद जो चीज़ सबसे ज्यादा मायने रखती है, वो है उसे रोज़ाना चलाने का खर्चा यानी रनिंग कॉस्ट। इस मोर्चे पर इलेक्ट्रिक गाड़ियां बहुत ही ज्यादा मजबूत स्थिति में खड़ी हैं। अगर आप अपनी इलेक्ट्रिक कार को घर की बिजली से चार्ज करते हैं, तो इसकी रनिंग कॉस्ट बमुश्किल ₹ 1.00 से ₹ 1.50 प्रति km के आस-पास आती है। यानी अगर आप रोज़ 50 km गाड़ी चलाते हैं, तो आपका महीने का खर्च ₹ 2,000 से भी कम आएगा। यह खर्च किसी भी पेट्रोल या डीजल गाड़ी के मुकाबले बेहद मामूली और ना के बराबर है।

एथनॉल गाड़ियों की बात करें तो एथनॉल की कीमत पेट्रोल के मुकाबले काफी कम होती है। सरकार एथनॉल को बढ़ावा देने के लिए इस पर टैक्स भी कम लगाती है, जिससे फ्लेक्स-फ्यूल पंपों पर एथनॉल आपको पेट्रोल से लगभग 30 से 40 प्रतिशत तक सस्ता मिल सकता है। लेकिन यहां एक छोटा सा पेंच भी है। एथनॉल की ऊर्जा क्षमता यानी कैलोरीफिक वैल्यू पेट्रोल के मुकाबले थोड़ी कम होती है, जिसका मतलब है कि शुद्ध एथनॉल पर चलने से गाड़ी का माइलेज लगभग 15 से 20 प्रतिशत तक गिर जाता है। भले ही ईंधन सस्ता मिले, लेकिन माइलेज कम होने की वजह से इसकी प्रति किलोमीटर रनिंग कॉस्ट लगभग ₹ 4.50 से ₹ 5.50 प्रति km के बीच बैठती है। यानी रनिंग कॉस्ट के सीधे मुकाबले में इलेक्ट्रिक गाड़ियां एथनॉल के मुकाबले बहुत ज्यादा सस्ती और किफायती साबित होती हैं।

दोनों तकनीकों के सभी मुख्य अंतरों और खूबियों की एक विस्तृत तुलनात्मक तालिका

भारत में चल रहे इस ऑटोमोटिव महायुद्ध को और भी आसान तरीके से समझने के लिए हमने दोनों तकनीकों के सभी जरूरी और व्यावहारिक पहलुओं को नीचे दी गई तालिका में बहुत ही साफ-साफ लिखा है।

तुलना के मुख्य बिंदुइलेक्ट्रिक व्हीकल (EV) तकनीकएथनॉल / फ्लेक्स-फ्यूल तकनीक
गाड़ी की शुरुआती कीमतबहुत ज्यादा (₹ 3.00 लाख से ₹ 5.00 लाख तक महंगी)काफी किफायती (सामान्य पेट्रोल कार जैसी कीमत)
प्रति किलोमीटर रनिंग कॉस्टबेहद कम (लगभग ₹ 1.00 से ₹ 1.50 per km)मध्यम (माइलेज कम होने के कारण ₹ 5.00 के आस-पास)
ईंधन भरने का समय45 मिनट से लेकर 6-8 घंटे तक का समयमहज 2 से 3 मिनट के भीतर टैंक फुल
रेंज और नेटवर्क की उपलब्धतासीमित चार्जिंग स्टेशंस और रेंज एंजाइटी का डरमौजूदा देशव्यापी पेट्रोल पंप नेटवर्क का पूरा फायदा
लंबी उम्र और मेंटेनेंसइंजन न होने से मेंटेनेंस कम, लेकिन बैटरी बदलने का भारी खर्चइंजन पार्ट्स का रेगुलर मेंटेनेंस, लेकिन कोई भारी सरप्राइज खर्च नहीं
पर्यावरण पर कुल प्रभावटेलपाइप एमिशन जीरो, लेकिन बिजली उत्पादन कोयले पर निर्भरपूरी तरह रिन्यूएबल साइकिल और कार्बन न्यूट्रल का भरोसा
रीसेल वैल्यू की स्थितिपुरानी होने पर बैटरी हेल्थ के कारण रीसेल वैल्यू अनिश्चितपारंपरिक गाड़ियों की तरह बेहद मजबूत और स्थिर रीसेल वैल्यू

मेंटेनेंस का खर्च और लंबे समय में रीसेल वैल्यू की सबसे बड़ी उलझन

एक इलेक्ट्रिक कार के अंदर पारंपरिक गाड़ियों की तरह कोई जटिल इंजन, पिस्टन, गियरबॉक्स, स्पार्क प्लग या मोबिल ऑयल नहीं होता। इसमें केवल एक बैटरी पैक और एक इलेक्ट्रिक मोटर होती है। इस वजह से शुरुआती सालों में ईवी का मेंटेनेंस खर्च लगभग जीरो के बराबर होता है। आपको बस समय पर इसके सस्पेंशन और ब्रेक्स की जांच करानी होती है। लेकिन इसमें सबसे बड़ा ट्विस्ट 8 से 10 साल बाद आता है, जब गाड़ी की वारंटी खत्म हो जाती है और उसकी बैटरी की क्षमता घटने लगती है। उस समय पूरी बैटरी को बदलने का खर्च गाड़ी की कुल कीमत का लगभग 40 से 50 प्रतिशत तक होता है, जो लाखों रुपयों में जाता है। इस भारी खर्च के डर की वजह से पुरानी इलेक्ट्रिक गाड़ियों की रीसेल वैल्यू मार्केट में काफी कम हो जाती है।

इसके विपरीत, एथनॉल से चलने वाली फ्लेक्स-फ्यूल गाड़ियों में वही पुराना इंजन होता है, जिसका मेंटेनेंस करने में हमारे देश का हर छोटा-बड़ा मैकेनिक पूरी तरह से माहिर है। इसमें आपको हर साल इंजन ऑयल, एयर फिल्टर और स्पार्क प्लग जैसी चीजें बदलवानी होती हैं, जिसका सालाना खर्च ₹ 4,000 से ₹ 6,000 के बीच आता है। भले ही इसमें हर साल थोड़ा-थोड़ा खर्च होता रहे, लेकिन इसमें कभी भी अचानक से लाखों रुपये की बैटरी बदलने जैसा कोई बड़ा झटका नहीं लगता। यही वजह है कि पुरानी होने के बाद भी इन गाड़ियों की रीसेल वैल्यू मार्केट में बहुत ही शानदार और स्थिर बनी रहती है, क्योंकि खरीदार को पता होता है कि इंजन सालों-साल बिना किसी बड़ी समस्या के चलता रहेगा।

आखिरकार इस महामुकाबले में जीत किसकी होगी और आपको कौन सी गाड़ी चुननी चाहिए

भारत में एथनॉल और इलेक्ट्रिक गाड़ियों के बीच चल रही यह छिपी हुई जंग असल में किसी एक की जीत या हार के साथ खत्म नहीं होने वाली है। ये दोनों ही तकनीकें भारत की अलग-अलग जरूरतों को पूरा करने के लिए बनाई गई हैं और आने वाले समय में ये दोनों ही सह-अस्तित्व यानी एक साथ बाजार में बनी रहेंगी। सरकार के लिए ये दोनों ही रास्ते बेहद जरूरी हैं क्योंकि दोनों ही देश का पैसा विदेशी कच्चे तेल पर खर्च होने से बचाते हैं और प्रदूषण को कम करने में मदद करते हैं।

अगर आप एक ऐसे शहर के निवासी हैं जहां का ट्रैफिक बहुत भारी रहता है, आपका रोज़ का सफर 40 से 60 km के भीतर सीमित है, और आपके पास अपने घर या अपार्टमेंट की पार्किंग में गाड़ी को रात भर चार्ज पर लगाने की पूरी सुविधा है, तो आपके लिए इलेक्ट्रिक गाड़ी से बेहतर और कोई विकल्प नहीं हो सकता। इसकी बेहद कम रनिंग कॉस्ट कुछ ही सालों में आपकी शुरुआती अतिरिक्त कीमत को पूरी तरह वसूल कर देगी। लेकिन अगर आपका बजट सीमित है, आप अक्सर लंबी दूरी की यात्राएं करते हैं, आपको हर समय चार्जिंग प्वाइंट ढूंढने के तनाव से दूर रहना है, और आप देश के किसानों को मजबूत बनाने वाली स्वदेशी तकनीक का हिस्सा बनना चाहते हैं, तो एथनॉल से चलने वाली फ्लेक्स-फ्यूल गाड़ी आपके लिए सबसे बेस्ट, व्यावहारिक और पैसा वसूल सौदा साबित होगी।

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