इलेक्ट्रिक कार का इंश्योरेंस महंगा होता है क्या? गहराई से समझिए

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भारत में ऑटोमोबाइल सेक्टर इस समय एक बहुत बड़े बदलाव के दौर से गुजर रहा है। पेट्रोल और डीजल की लगातार बढ़ती कीमतों और प्रदूषण को लेकर बढ़ती चिंताओं के बीच, आम आदमी अब तेजी से इलेक्ट्रिक वाहनों की तरफ मुड़ रहा है। जब कोई मिडिल क्लास व्यक्ति नई कार खरीदने का मन बनाता है, तो उसके दिमाग में सबसे पहले गाड़ी को चलाने का खर्च (रनिंग कॉस्ट) आता है। एक सामान्य पेट्रोल कार चलाने में जहां 10 से 12 रुपये प्रति km का खर्च आता है, वहीं इलेक्ट्रिक कार में यह खर्च घटकर मात्र 1 से 2 रुपये प्रति km रह जाता है। यह बचत किसी भी ग्राहक को इलेक्ट्रिक कार खरीदने के लिए प्रेरित करने के लिए काफी है।

लेकिन, उत्साह का यह बुलबुला तब फूट जाता है जब ग्राहक शोरूम में अपनी पसंदीदा कार का कोटेशन देखता है। जब उसकी नजर इंश्योरेंस के अमाउंट पर पड़ती है, तो वह हैरान रह जाता है। कई ग्राहकों का सबसे पहला सवाल यही होता है कि क्या इलेक्ट्रिक कार का इंश्योरेंस सच में पेट्रोल या डीजल कार से इतना ज्यादा महंगा होता है? इसका सीधा और स्पष्ट जवाब है हां, यह महंगा होता है। लेकिन इंश्योरेंस कंपनियों द्वारा लिए जाने वाले इस ऊंचे प्रीमियम के पीछे कई सारे तकनीकी कारण, बाजार के रिस्क और पुर्जों की भारी कीमत छिपी है। इस विस्तृत आर्टिकल में हम बहुत ही आसान भाषा में यह समझेंगे कि आखिर क्यों एक आम आदमी को अपनी इलेक्ट्रिक कार को सुरक्षित रखने के लिए ज्यादा पैसे चुकाने पड़ते हैं, और क्या यह अतिरिक्त खर्च वसूल होता है या नहीं।

टेक्निकल डीप डाइव: इलेक्ट्रिक कार और इंश्योरेंस का गणित

एक सामान्य इंसान के लिए कार का मतलब इंजन, गियरबॉक्स और चार पहिए होता है। लेकिन इलेक्ट्रिक कार की बनावट पारंपरिक इंजन वाली कारों से बिल्कुल अलग होती है। इलेक्ट्रिक कार इंश्योरेंस के महंगे होने के कुछ सबसे प्रमुख तकनीकी कारण इस प्रकार हैं:

सबसे बड़ा कारण कार का बैटरी पैक है। एक साधारण पेट्रोल कार में इंजन की कीमत कुल गाड़ी की कीमत का एक छोटा हिस्सा होती है। लेकिन एक इलेक्ट्रिक वाहन में, उसकी कुल कीमत का लगभग 40 से 50 प्रतिशत हिस्सा सिर्फ उसके लिथियम-आयन बैटरी पैक का होता है। इंश्योरेंस कंपनियों के लिए सबसे बड़ा वित्तीय रिस्क यही बैटरी पैक है। ऑटोमोटिव रिसर्च एसोसिएशन ऑफ इंडिया (ARAI) जैसी संस्थाएं इन बैटरियों की सुरक्षा की कड़ी जांच करती हैं ताकि ये आग और पानी से सुरक्षित रहें। लेकिन रियल-वर्ल्ड में अगर आपकी कार किसी ऊंचे बंपर या सड़क पर पड़े किसी बड़े पत्थर से टकरा जाती है और गाड़ी के नीचे लगे बैटरी पैक की बाहरी केसिंग में हल्का सा भी क्रैक आ जाता है, तो इंश्योरेंस कंपनी उसे रिपेयर करने का रिस्क नहीं लेती। सुरक्षा कारणों से पूरा बैटरी पैक बदला जाता है, जिसका सीधा खर्च कई लाख रुपये आता है। एक छोटे से एक्सीडेंट में गाड़ी के टोटल लॉस में जाने की संभावना पेट्रोल कार के मुकाबले कहीं ज्यादा होती है।

दूसरा बड़ा कारण गाड़ी में मौजूद हाई-टेक सिस्टम और इलेक्ट्रॉनिक्स हैं। आधुनिक इलेक्ट्रिक कारें सिर्फ मोटर से नहीं चलतीं, वे बड़े सॉफ्टवेयर और सेंसर्स का एक जटिल नेटवर्क होती हैं। इनमें आपको एडवांस ड्राइवर असिस्टेंस सिस्टम (ADAS), टचस्क्रीन सिस्टम, कई सारे रडार और हाई-रेजोल्यूशन कैमरे मिलते हैं। ये सभी महंगे और संवेदनशील उपकरण आमतौर पर गाड़ी के बंपर, ग्रिल या साइड मिरर के पास लगे होते हैं। पेट्रोल कार में एक मामूली टक्कर होने पर सिर्फ प्लास्टिक का बंपर बदला जाता है। लेकिन इलेक्ट्रिक कार के मामले में, आपको बंपर के साथ-साथ खराब हुए सेंसर्स बदलने पड़ते हैं और फिर उन्हें कंप्यूटर के जरिए कैलिब्रेट करना पड़ता है। यह काम काफी महंगा होता है।

तीसरा कारण सर्विस और रिपेयर नेटवर्क की कमी है। आप अपनी इलेक्ट्रिक कार को किसी भी आम सड़क किनारे वाले गैरेज में ठीक कराने के लिए नहीं ले जा सकते। इसके हाई-वोल्टेज सिस्टम में काम करने के लिए खास तौर पर प्रशिक्षित और सर्टिफाइड तकनीशियनों की जरूरत होती है। वर्तमान में ये तकनीशियन सिर्फ ऑथराइज्ड सर्विस सेंटर पर ही मिलते हैं। बाजार में प्रतिस्पर्धा की कमी होने के कारण, लेबर चार्ज काफी ज्यादा होता है, जिसका सीधा असर इंश्योरेंस क्लेम के बिल और अंततः आपके प्रीमियम पर पड़ता है।

रियल-वर्ल्ड यूसेज: शहर और हाईवे का ड्राइविंग अनुभव

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जब आप अपनी कार लेकर दिल्ली जैसे शहरों के ट्रैफिक में निकलते हैं, तो उसका इस्तेमाल किस तरह से हो रहा है, यह इंश्योरेंस के खर्च को गहराई से प्रभावित करता है। हाईवे पर चलते हुए रेंज की चिंता (रेंज एंग्जायटी) तो ड्राइवर को रहती ही है, जिसके कारण वह अक्सर चार्जिंग स्टेशनों की तलाश में रहता है। पेट्रोल डलवाने में कुछ ही सेकंड लगते हैं और एक बार में 40 लीटर टैंक फुल हो जाता है, जिससे आप लंबा सफर कर सकते हैं। लेकिन इलेक्ट्रिक कार को फुल चार्ज होने में 6 से 8 घंटे का समय लगता है।

शहरों के अंदर रोजमर्रा के इस्तेमाल में गाड़ी के डैमेज होने का रिस्क ज्यादा होता है। भारत के शहरों में बरसात के मौसम में सड़कों पर जलभराव एक बहुत आम समस्या है। इलेक्ट्रिक कारों को पानी से बचाने के लिए अच्छी सीलिंग दी जाती है और वे IP67 रेटिंग के साथ आती हैं, लेकिन फिर भी अगर बहुत ज्यादा पानी बैटरी कम्पार्टमेंट या इलेक्ट्रिक मोटर के अंदर चला जाए, तो शॉर्ट सर्किट का एक बड़ा खतरा हमेशा बना रहता है। इस रियल-वर्ल्ड रिस्क को कवर करने के लिए इंश्योरेंस कंपनियां ज्यादा प्रीमियम चार्ज करती हैं।

यहां पर आपको मोटर इंश्योरेंस के दो मुख्य हिस्सों को समझना होगा: थर्ड-पार्टी इंश्योरेंस और ओन डैमेज कवर। पर्यावरण को बचाने और ग्रीन एनर्जी को बढ़ावा देने के लिए, इंश्योरेंस रेगुलेटरी एंड डेवलपमेंट अथॉरिटी ऑफ इंडिया (IRDAI) इलेक्ट्रिक कारों के लिए थर्ड-पार्टी प्रीमियम पर फ्लैट 15 प्रतिशत की विशेष छूट देती है। यानी कानूनी तौर पर जरूरी थर्ड-पार्टी कवर इलेक्ट्रिक कार के लिए सस्ता है। लेकिन आपकी अपनी गाड़ी को होने वाले नुकसान की भरपाई ओन डैमेज कवर से होती है। चूंकि इलेक्ट्रिक कार की शुरुआती एक्स-शोरूम कीमत अपने पेट्रोल वर्शन से काफी ज्यादा होती है, इसलिए उसकी इंश्योर्ड डिक्लेयर्ड वैल्यू (IDV) भी ज्यादा होती है। आईडिवी ज्यादा होने का सीधा गणित यह है कि आपको ओन डैमेज के लिए भारी प्रीमियम देना होगा। इसके अतिरिक्त, इलेक्ट्रिक कारों के मामले में चार्जिंग स्टेशन, केबल और बैटरी की लंबी उम्र के लिए जो विशेष ऐड-ऑन कवर लिए जाते हैं, वे इस प्रीमियम को और भी ऊपर ले जाते हैं।

मार्केट पोजिशन: पेट्रोल VS इलेक्ट्रिक इंश्योरेंस प्रीमियम

बाजार में इस समय कई ऐसे वाहन मौजूद हैं जो एक ही मॉडल नाम से पेट्रोल और इलेक्ट्रिक दोनों अवतारों में आते हैं। इससे हमें इंश्योरेंस प्रीमियम के वास्तविक अंतर को समझने में काफी मदद मिलती है। आइए एक सामान्य कॉम्पैक्ट एसयूवी के पेट्रोल और इलेक्ट्रिक वेरिएंट के इंश्योरेंस खर्च की तुलना करें ताकि आपको वैल्यू फॉर मनी का सही गणित समझ आ सके।

नीचे दी गई टेबल में एक अनुमानित तुलना दिखाई गई है:

विवरण और फीचर्सपेट्रोल कार (अनुमानित आंकड़ा)इलेक्ट्रिक कार (अनुमानित आंकड़ा)
एक्स-शोरूम कीमत11 लाख रुपये15 लाख रुपये
इंश्योर्ड डिक्लेयर्ड वैल्यू (IDV)10.45 लाख रुपये14.25 लाख रुपये
थर्ड-पार्टी प्रीमियम (IRDAI दरें)3416 रुपये2904 रुपये (15 प्रतिशत छूट)
ओन डैमेज बेस प्रीमियम18000 रुपये26000 रुपये
बैटरी और मोटर प्रोटेक्शन ऐड-ऑनलागू नहीं4500 रुपये
कुल इंश्योरेंस खर्च (सभी टैक्स सहित)लगभग 26000 रुपयेलगभग 38000 रुपये

इस टेबल से साफ जाहिर होता है कि भले ही सरकार की तरफ से थर्ड-पार्टी प्रीमियम पर छूट मिल रही हो, लेकिन ज्यादा आईडिवी और इलेक्ट्रिक कारों के लिए जरूरी विशेष ऐड-ऑन की वजह से इलेक्ट्रिक कार का कुल इंश्योरेंस पेट्रोल कार के मुकाबले काफी महंगा हो जाता है। अगर हम वैल्यू फॉर मनी के नजरिए से देखें, तो शुरुआत में शोरूम से गाड़ी निकालते वक्त यह इंश्योरेंस का खर्च आपको बहुत अखर सकता है। लेकिन अगर आप नियमित रूप से गाड़ी का इस्तेमाल करते हैं और हर महीने हजार से पंद्रह सौ km गाड़ी चलाते हैं, तो एक ही साल में आप पेट्रोल के मुकाबले जो भारी बचत करेंगे, वह इस अतिरिक्त प्रीमियम के खर्च को आसानी से कवर कर लेगी। लंबी अवधि में इलेक्ट्रिक कार एक फायदे का सौदा साबित होती है।

हमारी राय: क्या आपको इंतजार करना चाहिए या खरीद लेनी चाहिए?

एक ऑटोमोटिव एक्सपर्ट के तौर पर हमारी राय बिल्कुल स्पष्ट है। अगर आप सिर्फ इस बात से घबराकर इलेक्ट्रिक कार खरीदने का फैसला टाल रहे हैं कि उसका इंश्योरेंस थोड़ा महंगा है, तो आपको अपनी सोच बदलनी चाहिए। आपको इस आधुनिक तकनीक, शांत केबिन और बेहद कम रनिंग कॉस्ट का फायदा जरूर उठाना चाहिए। यह सच है कि प्रीमियम ज्यादा है, लेकिन कुछ स्मार्ट कदम उठाकर आप अपनी जेब पर पड़ने वाले इस बोझ को कम कर सकते हैं।

सबसे पहली और जरूरी सलाह यह है कि प्रीमियम बचाने के चक्कर में कभी भी बैटरी प्रोटेक्शन और रिटर्न टू इनवॉयस जैसे महत्वपूर्ण ऐड-ऑन लेने से पीछे न हटें। शुरुआत में चंद हजार रुपये बचाने का लालच आपको किसी दुर्घटना के समय लाखों रुपये के नुकसान में डाल सकता है। हमेशा जीरो डेप्रिसिएशन कवर के साथ बैटरी प्रोटेक्शन जरूर खरीदें।

अगर आप अपना प्रीमियम थोड़ा कम करना चाहते हैं, तो वॉलंटरी डिडक्टिबल का विकल्प चुन सकते हैं। इसका मतलब यह है कि किसी भी क्लेम के समय एक छोटी सी पहले से तय रकम आप अपनी जेब से देंगे, जिसके बदले में इंश्योरेंस कंपनी आपका सालाना प्रीमियम कम कर देती है। सुरक्षित और संभलकर गाड़ी चलाना सबसे अच्छा उपाय है, ताकि आप हर साल नो क्लेम बोनस (NCB) का पूरा फायदा उठा सकें और अगले साल के प्रीमियम में भारी छूट पा सकें।

आजकल भारतीय बाजार में बैटरी एज ए सर्विस (BaaS) का नया और शानदार मॉडल आ गया है। इस मॉडल के तहत ग्राहक सिर्फ गाड़ी का ढांचा और मोटर खरीदता है, और बैटरी को कंपनी से किलोमीटर के हिसाब से किराये पर लेता है। चूंकि बैटरी कानूनी रूप से आपकी नहीं होती और गाड़ी की खरीद कीमत में शामिल नहीं होती, इसलिए कार की आईडिवी 30 से 40 प्रतिशत तक कम हो जाती है। इसका सीधा और बड़ा असर आपके इंश्योरेंस पर पड़ता है और आपका प्रीमियम एक पेट्रोल कार के बराबर या उससे भी कम हो जाता है। यह मॉडल उन ग्राहकों के लिए एक गेम चेंजर साबित हो रहा है जो शुरुआत में ज्यादा कीमत नहीं चुकाना चाहते।

भविष्य की राह और सरकारी नीतियां

वर्तमान स्थिति को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि इलेक्ट्रिक वाहनों के लिए इंश्योरेंस बाजार अभी अपने शुरुआती चरण में है और ग्राहकों के लिए थोड़ा महंगा है। इंश्योरेंस कंपनियों के पास अभी भी इलेक्ट्रिक कारों के एक्सीडेंट, बैटरी के खराब होने और लंबे समय तक इस्तेमाल के ऐतिहासिक डेटा की बहुत कमी है। रिस्क का पूरी तरह से अंदाजा न होने के कारण कंपनियां सुरक्षित रास्ता अपनाती हैं और ज्यादा प्रीमियम वसूलती हैं।

लेकिन यह स्थिति हमेशा ऐसी नहीं रहने वाली है। जैसे-जैसे भारतीय सड़कों पर इलेक्ट्रिक गाड़ियों की संख्या बढ़ेगी और इंश्योरेंस कंपनियों के पास डेटा इकट्ठा होगा, रिस्क का सही और सटीक आकलन करना आसान हो जाएगा। सरकारी नीतियां जैसे कि FAME III और विभिन्न राज्यों की अपनी ईवी नीतियां स्थानीय स्तर पर पार्ट्स के निर्माण को भारी बढ़ावा दे रही हैं। आने वाले समय में जब लिथियम-आयन बैटरियां और गाड़ियों के महंगे स्पेयर पार्ट्स पूरी तरह से भारत में ही बनने लगेंगे, तब उनकी कीमत में भारी गिरावट आएगी। इसके साथ ही, जब हर शहर और गली के मैकेनिक को हाई-वोल्टेज सिस्टम सुधारने की उचित ट्रेनिंग मिल जाएगी, तब ऑथराइज्ड सर्विस सेंटरों का एकाधिकार खत्म होगा और लेबर कॉस्ट भी तेजी से गिरेगी। इन सभी कारकों के मिलने से भविष्य में इलेक्ट्रिक कारों का इंश्योरेंस प्रीमियम काफी हद तक स्थिर और सस्ता हो जाएगा। तब तक के लिए, एक स्मार्ट और जागरूक ग्राहक बनें, अपनी गाड़ी के रिस्क को समझें, सही कवरेज चुनें और भारत की नई इलेक्ट्रिक मोबिलिटी की क्रांति का आनंद लें।

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