दिल्ली सरकार की नई इलेक्ट्रिक वाहन नीति यानी दिल्ली ईवी पॉलिसी 2.0 अब अपने परामर्श के अंतिम चरण में पहुंच गई है। 11 अप्रैल को फीडबैक के लिए जारी किए गए इस मसौदे का उद्देश्य दिल्ली को भारत की इलेक्ट्रिक वाहन राजधानी बनाना है। इस नई नीति के तहत सरकार ने साल 2027 तक दिल्ली में होने वाले कुल पंजीकरणों में 95 प्रतिशत हिस्सेदारी इलेक्ट्रिक वाहनों की करने का साहसिक लक्ष्य रखा है। यह नीति केवल सब्सिडी देने तक सीमित नहीं है, बल्कि पुराने वाहनों को हटाने (स्क्रैपेज) और चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करने पर केंद्रित है। हालांकि, फीडबैक की समयसीमा समाप्त होने से पहले उद्योग जगत ने दो बड़े अंतराल की ओर इशारा किया है जो इस लक्ष्य की राह में बाधा बन सकते हैं।
नीति के मुख्य आकर्षण और बड़े बदलाव
दिल्ली ईवी पॉलिसी 2.0 पिछले संस्करण की तुलना में अधिक परिपक्व मानी जा रही है। इसमें सीधे तौर पर दी जाने वाली सब्सिडी के बजाय पुराने बीएस 4 या उससे नीचे के वाहनों को स्क्रैप करने पर मिलने वाले लाभों पर अधिक जोर दिया गया है। इसके अलावा, किफायती इलेक्ट्रिक वाहनों और स्ट्रॉन्ग हाइब्रिड कारों के लिए पंजीकरण शुल्क और टैक्स में राहत का प्रस्ताव है। नीति का एक सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा यह है कि 1 अप्रैल 2028 से दिल्ली में केवल इलेक्ट्रिक दोपहिया वाहनों के नए पंजीकरण की अनुमति देने का प्रस्ताव रखा गया है। सरकार इस पूरी योजना के लिए लगभग 3,600 करोड़ रुपये के निवेश की तैयारी कर रही है, जिसका रोडमैप मार्च 2030 तक फैला हुआ है।
चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर: सफलता की सबसे बड़ी कड़ी

विशेषज्ञों का मानना है कि नीति का इरादा बहुत मजबूत है, लेकिन इसकी सफलता पूरी तरह से चार्जिंग स्टेशनों की तैनाती पर निर्भर करेगी। वर्तमान में दिल्ली में 5,000 से भी कम सार्वजनिक चार्जिंग पॉइंट हैं, जबकि साल 2026 के अंत तक इसे 18,000 तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया है। यदि चार्जिंग नेटवर्क वाहनों की बिक्री की रफ्तार के साथ तालमेल नहीं बिठा पाया, तो यह पूरी प्रक्रिया के लिए एक बड़ी बाधा बन सकता है। चार्जिंग स्टेशनों की संख्या बढ़ने से न केवल व्यक्तिगत वाहन मालिकों को सुविधा होगी, बल्कि व्यावसायिक ट्रकों और बसों के डीजल खर्च में भी भारी कटौती की जा सकेगी, जिससे देश के ईंधन आयात बिल में सालाना लगभग 46,000 करोड़ रुपये की बचत हो सकती है।
रेट्रोफिटिंग: पुराने वाहनों को नया जीवन देने की मांग
ईवी उद्योग के कई हितधारकों का कहना है कि वर्तमान नीति का ध्यान केवल नए वाहनों की बिक्री पर केंद्रित है। भारत की सड़कों पर पहले से ही 30 करोड़ से अधिक पेट्रोल और डीजल वाहन मौजूद हैं। इन पुराने वाहनों के पूरी तरह से हटने का इंतजार करने के बजाय, उन्हें ‘रेट्रोफिटिंग’ के जरिए इलेक्ट्रिक में बदलना एक बेहतर विकल्प हो सकता है। रेट्रोफिटिंग वह प्रक्रिया है जिसमें इंजन और फ्यूल टैंक को हटाकर इलेक्ट्रिक मोटर और बैटरी पैक लगा दिया जाता है। इससे न केवल प्रदूषण तुरंत कम होगा, बल्कि वाहन मालिकों को नया वाहन खरीदने के भारी खर्च से भी राहत मिलेगी। उद्योग की मांग है कि रेट्रोफिटिंग को औपचारिक रूप से नीति का हिस्सा बनाया जाए।
रेट्रोफिटिंग का आर्थिक गणित और व्यावसायिक लाभ
रेट्रोफिटिंग न केवल पर्यावरण के लिए अच्छी है, बल्कि यह आर्थिक रूप से भी फायदेमंद साबित हो सकती है। व्यावसायिक वाहनों और टैक्सियों के लिए यह तकनीक बहुत कारगर है क्योंकि ये वाहन प्रतिदिन 150 से 250 Km चलते हैं। रेट्रोफिटिंग के जरिए प्रति किलोमीटर होने वाली बचत 60 से 70 प्रतिशत तक हो सकती है, जिससे इस तकनीक पर आने वाला खर्च मात्र 18 से 24 महीनों में वसूल हो जाता है। दिल्ली में ‘xEV हब’ बनाने का प्रस्ताव भी दिया गया है जहाँ चार्जिंग, रेट्रोफिटिंग और फाइनेंसिंग जैसी सभी सुविधाएं एक ही स्थान पर उपलब्ध हों।
रेट्रोफिटिंग के लिए संभावित लागत तालिका
विभिन्न वाहनों को इलेक्ट्रिक में बदलने के लिए अनुमानित लागत नीचे दी गई है:
| वाहन का प्रकार | रेट्रोफिटिंग की अनुमानित लागत |
| यात्री कारें | 4 से 6 लाख रुपये |
| बसें | 8 से 10 लाख रुपये |
| ऑटो और हल्के वाणिज्यिक वाहन (LCV) | 1.5 से 2 लाख रुपये |
उद्योग जगत की सरकार से प्रमुख मांगें
ईवी पॉलिसी 2.0 को अंतिम रूप देने से पहले उद्योग जगत ने निम्नलिखित बिंदुओं को मजबूत करने का सुझाव दिया है:
- चार्जिंग स्टेशनों की तैनाती के लिए समयबद्ध और जवाबदेह योजना बनाना।
- रेट्रोफिटिंग को औपचारिक मान्यता देना और इसके लिए मानक व प्रोत्साहन तय करना।
- बैटरी लीजिंग और स्वैपिंग जैसे मॉडल को बढ़ावा देना ताकि शुरुआत में पड़ने वाला आर्थिक बोझ कम हो सके।
- ईवी सेवाओं के लिए एकीकृत हब विकसित करना जहाँ मरम्मत और चार्जिंग एक साथ हो सके।
- पुराने वाणिज्यिक वाहनों और टैक्सियों के लिए विशेष रेट्रोफिटिंग छूट प्रदान करना।
मेंसइवी का दृष्टिकोण: ईवी पॉलिसी 2.0 पर राय
मेंसइवी पर हमारा मानना है कि दिल्ली सरकार की यह नई नीति भारत के मोबिलिटी ट्रांज़िशन के लिए एक ऐतिहासिक क्षण है। 2027 तक 95 प्रतिशत ईवी अपनाने का लक्ष्य तभी प्राप्त किया जा सकता है जब सरकार और उद्योग मिलकर काम करें। केवल नए वाहनों की बिक्री पर निर्भर रहना काफी नहीं होगा; रेट्रोफिटिंग को बढ़ावा देना और चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर की विश्वसनीयता सुनिश्चित करना ही इस नीति की सफलता की असली चाबी है। यदि दिल्ली इस मॉडल को सफलतापूर्वक लागू कर पाती है, तो यह अन्य राज्यों के लिए एक बेहतरीन उदाहरण बनेगा।
सामान्य प्रश्न (FAQ)
1. दिल्ली ईवी पॉलिसी 2.0 का मुख्य लक्ष्य क्या है?
इसका मुख्य लक्ष्य साल 2027 तक दिल्ली में होने वाले नए वाहन पंजीकरणों में 95 प्रतिशत हिस्सेदारी इलेक्ट्रिक वाहनों की करना है।
2. क्या 2028 के बाद दिल्ली में पेट्रोल बाइक खरीदी जा सकेंगी?
प्रस्ताव के अनुसार, 1 अप्रैल 2028 से दिल्ली में केवल इलेक्ट्रिक दोपहिया वाहनों के नए पंजीकरण की अनुमति दी जाएगी।
3. रेट्रोफिटिंग क्या है और यह क्यों जरूरी है?
रेट्रोफिटिंग पुरानी पेट्रोल या डीजल कारों के इंजन को हटाकर इलेक्ट्रिक मोटर लगाने की प्रक्रिया है। यह पुराने वाहनों से होने वाले प्रदूषण को तुरंत कम करने का एक प्रभावी तरीका है।
4. दिल्ली में 2026 तक कितने चार्जिंग स्टेशन लगाने का लक्ष्य है?
सरकार ने साल 2026 के अंत तक दिल्ली में सार्वजनिक चार्जिंग पॉइंट्स की संख्या को 18,000 तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा है।
5. क्या रेट्रोफिटिंग के बाद वाहन का खर्चा कम हो जाता है?
हाँ, रेट्रोफिटिंग के बाद प्रति किलोमीटर परिचालन लागत में 60 से 70 प्रतिशत तक की कमी आ सकती है और इसका खर्च 2 साल के भीतर वसूल हो सकता है।








